Thursday, February 11, 2010

कुछ कहो कुछ भी कहो,
कुछ कहो कुछ भी कहो,
क्या कहना है क्या सुन्ना है,
मुझको पता तुमको पता है
समय का ये पल थम सा गया है,
और इस पल में कोई नहीं है,
बस एक मैं हूँ बस एक तुम हो,
कुछ कहो...
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कितने गहरे हलके शाम के रंग है छलके,
परबत से यूँ उतरे बदल जैसे अंचल ढलके,
कितने गहरे हलके शाम के रंग है छलके,
परबत से यूँ उतरे बदल जैसे अंचल ढलके,
और इस पल में कोई नहीं है
बस एक मैं हूँ बस एक तुम हो,
कुछ कहो...
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सुलगी सुलगी सासें बहकी बहकी धड़कन,
महके महके शाम के साये पिघले पिघले तन मान,
सुलगी सुलगी सासें बहकी बहकी धड़कन,
महके महके शाम के साये पिघले पिघले तन मान,
और इस पल में कोई नहीं है
बस एक मैं हूँ बस एक तुम हो,
कुछ कहो...

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