Wednesday, February 3, 2010

... खण्डहर भी देखना ...
इत्मिनान से यूँ कभी, मेरे अन्दर भी देखना,
मेरे दिल में अपने लिये,वो मंज़र भी देखना.

पूरा शहर है बसता,इस फ़कीर की आँखों में,
उफ़ान में बहता, ख़ामोश समंदर भी देखना.

कोई ग़म मुक़म्मल नहीं, मोहब्बत से ज़्यादा,
उस ताज़ा चोट में अटका, नश्तर भी देखना.

मेरी ज़ुबान है कड़वी, मगर ख़यालात हैं मीठे,
हर इन्सां में बसता,सच्चा फ़नकार भी देखना.

तस्वीर बना कर, मिटा देती हो हाथों से अपने,
हर रंग में रहता वो सुकून-ए-अम्बर भी देखना.

तुम रो कर बहा दी, गुज़रे लमहों का हिसाब,
इबादत में शामिल, मेरे आडम्बर भी देखना.

ग़म नहीं हमें,तुम किसी और का चाँद सही,
घर में रह कर पलता, खण्डहर भी देखना।

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