Monday, February 15, 2010

तुम्हारे चेहरे में नूरे सहर क़यामत देखा,
तुम्हारे आशना में ऱब का इनायत देखा.

उस चाँद को भी रस्क है, तेरी नूरानी पर,
सजदे में हाज़िर मोहब्बत में इबादत देखा.

ज़िक्र जब भी छेड़ा किसी ने मेरे नाम का,
घूँघट से झाक्तें, वाह! क्या शरारत देखा.

धीरे धीरे मैंने समझा, दिल के वो इशारे,
क़ैद ऐसी,कि न मिले कभी ज़मानत देखा.

तेरे जवानी ने यहाँ पैदा किये तमाम मजनू,
कैसे दिल चुपचाप जलता ये करामत देखा.

कुछ तो बात है ज़ालिम तेरी इन अदाओं में,
कायनात में मरते यूँ किस को सलामत देखा.

चलो हम आज, ऐतबार कर लेते कुछ तुम पे,
होठ थे ख़ामोश मगर आँखों में अदावत देखा.

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