हक़ हम झूठ का, ज़िन्दगी भर निभाते रहे,
बगैर ज़मीं इन ख़ाबों की माला पिरोते रहे.
कहने को हर एहसास हैं यहाँ, सच मगर,
आइने से चेहरे को छुपाये,होश गवांते रहे.
चाहा उन्हें बहुत हमने,ये धड़कने गवाह हैं,
बात नीयत कि थी,अज़नबी से बुलाते रहे,
इल्म हमें रस्म- ए-राह निभाने के दस्तूर,
वादा बेवफाई का,लम्हा लम्हा बढ़ाते रहे.
बातें कई निकलीं, मेरे मोहब्बत के नाम,
तुमसे सुन,हम सारे शहर को सुनाते रहे.
दिल का क्या कहें,वो तो अजीब बस्ती है,
गैरों से तुम इन घरों को, क्यों लुटाते रहे.
माना ख़ुदा है बसता, मेरे तुम्हारे दिल में,
जाने क्यों दिल को यूँ टुकड़ों में बाँटते रहे.