Thursday, February 18, 2010

... दिल को टुकड़ों में बाँटते रहे ...
हक़ हम झूठ का, ज़िन्दगी भर निभाते रहे,
बगैर ज़मीं इन ख़ाबों की माला पिरोते रहे.

कहने को हर एहसास हैं यहाँ, सच मगर,
आइने से चेहरे को छुपाये,होश गवांते रहे.

चाहा उन्हें बहुत हमने,ये धड़कने गवाह हैं,
बात नीयत कि थी,अज़नबी से बुलाते रहे,

इल्म हमें रस्म- ए-राह निभाने के दस्तूर,
वादा बेवफाई का,लम्हा लम्हा बढ़ाते रहे.

बातें कई निकलीं, मेरे मोहब्बत के नाम,
तुमसे सुन,हम सारे शहर को सुनाते रहे.

दिल का क्या कहें,वो तो अजीब बस्ती है,
गैरों से तुम इन घरों को, क्यों लुटाते रहे.

माना ख़ुदा है बसता, मेरे तुम्हारे दिल में,
जाने क्यों दिल को यूँ टुकड़ों में बाँटते रहे.

Monday, February 15, 2010

तुम्हारे चेहरे में नूरे सहर क़यामत देखा,
तुम्हारे आशना में ऱब का इनायत देखा.

उस चाँद को भी रस्क है, तेरी नूरानी पर,
सजदे में हाज़िर मोहब्बत में इबादत देखा.

ज़िक्र जब भी छेड़ा किसी ने मेरे नाम का,
घूँघट से झाक्तें, वाह! क्या शरारत देखा.

धीरे धीरे मैंने समझा, दिल के वो इशारे,
क़ैद ऐसी,कि न मिले कभी ज़मानत देखा.

तेरे जवानी ने यहाँ पैदा किये तमाम मजनू,
कैसे दिल चुपचाप जलता ये करामत देखा.

कुछ तो बात है ज़ालिम तेरी इन अदाओं में,
कायनात में मरते यूँ किस को सलामत देखा.

चलो हम आज, ऐतबार कर लेते कुछ तुम पे,
होठ थे ख़ामोश मगर आँखों में अदावत देखा.

Saturday, February 13, 2010

आये तुम याद मुझे गाने लगी हर धड़कन,
खुश्बू लायी पवन, महका चन्दन,
आये तुम याद मुझे.........
जब मैं रातों में तारें गिनता हूँ,
और तेरे क़दमों की आहट सुनता हूँ
लगे मुझे हर तारा तेरा दर्पण,
आये तुम .......
खुसबू लायी.....
आये तुम याद मुझे....
_________

जिस पल नैनो में सपना तेरे आये,
उस पल मौसम पर मेहँदी रच जाए,
और तू बन जाये जैसे दुल्हन
...............

हर पल मन मेरा मुझसे कहता है ,
जिसकी धुन में तू खोया रहता है
भर दे फूलों से उसका दामन,
आये तुम याद मुझे....

Thursday, February 11, 2010

... हासिल हर मंज़िल अनजाना करना ...
ज़िन्दगी में रास्ते तुम, चला अपना करना,
हासिल हर मंज़िल हमेशा अनजाना करना.

जवानी के मोड़ पे, जब राहों को तुम चुनो,
किसी की ख्वाइश बनो यही तमन्ना करना.

है मुमकिन कठिनाईयां साथ न छोड़ें कभी,
हुनर इन हाथों का,न कभी विराना करना.

सफ़र में शाम जल्द हो , और धुंद घिर जाये,
हौसले से अपनी बेबसी को,अनजाना करना.

ये दीवारें याद करेंगी, ये बहारें याद करेंगी,
अपनी इन यादों को, न कभी पुराना करना.

उम्मीद हो तुम हमारे अरमान हो जहाँ का,
अपने ज़मीर को न कभी तुम बेगाना करना.

दुआ है मेरी , तुम सूरज सा चमको दुनियाँ में,
अपने वुज़ुद को औरों के लिये नज़राना करना.
कुछ कहो कुछ भी कहो,
कुछ कहो कुछ भी कहो,
क्या कहना है क्या सुन्ना है,
मुझको पता तुमको पता है
समय का ये पल थम सा गया है,
और इस पल में कोई नहीं है,
बस एक मैं हूँ बस एक तुम हो,
कुछ कहो...
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कितने गहरे हलके शाम के रंग है छलके,
परबत से यूँ उतरे बदल जैसे अंचल ढलके,
कितने गहरे हलके शाम के रंग है छलके,
परबत से यूँ उतरे बदल जैसे अंचल ढलके,
और इस पल में कोई नहीं है
बस एक मैं हूँ बस एक तुम हो,
कुछ कहो...
_____
सुलगी सुलगी सासें बहकी बहकी धड़कन,
महके महके शाम के साये पिघले पिघले तन मान,
सुलगी सुलगी सासें बहकी बहकी धड़कन,
महके महके शाम के साये पिघले पिघले तन मान,
और इस पल में कोई नहीं है
बस एक मैं हूँ बस एक तुम हो,
कुछ कहो...

Friday, February 5, 2010

हम भारतियों की विडम्बना..

इस देश की विडम्बना है, हम नेताओं को नेता बनाये रखने के लिये जितना खर्च और प्रयास करते हैं उतना हम देशवासियों का जीवन खुशहाल करने के लिये नहीं करते. हमारी सोच हमें अपने देश की तरफ कम मगर नेताओं की नेतागिरी की तरफ ज्यादा आकर्षित करता है. पैसा जो इन सफ़ेद पोशों पे खर्च होता है वो सभी भारतियों का है किन्तु हम देश वासियों के हाँथ सिवा आश्वासन और सपनों के कुछ भी नहीं..ये नेता हमारी हाथों में शब्दों की रेत हथेलियों पे डाल जाते हैं और किसी तमाशबीन की तरह मदारी का नाच देखते रहते हैं..जाने कब इस मायाजाल और भ्रम से हम भारतीय उभर पाएंगे....
शोहरत के ख़रीदारों में, क्यों हो गये शामिल,
हमने तो पाया है उसे अपनी ज़िन्दगी खो कर.

Wednesday, February 3, 2010

क्या मुवावज़ा पाऊंगा मैं, तुमसे उसूलों के बदले,
बहुत दिनों से ज़मीर ने,मुझे अकेला छोड़ रखा है.
... खण्डहर भी देखना ...
इत्मिनान से यूँ कभी, मेरे अन्दर भी देखना,
मेरे दिल में अपने लिये,वो मंज़र भी देखना.

पूरा शहर है बसता,इस फ़कीर की आँखों में,
उफ़ान में बहता, ख़ामोश समंदर भी देखना.

कोई ग़म मुक़म्मल नहीं, मोहब्बत से ज़्यादा,
उस ताज़ा चोट में अटका, नश्तर भी देखना.

मेरी ज़ुबान है कड़वी, मगर ख़यालात हैं मीठे,
हर इन्सां में बसता,सच्चा फ़नकार भी देखना.

तस्वीर बना कर, मिटा देती हो हाथों से अपने,
हर रंग में रहता वो सुकून-ए-अम्बर भी देखना.

तुम रो कर बहा दी, गुज़रे लमहों का हिसाब,
इबादत में शामिल, मेरे आडम्बर भी देखना.

ग़म नहीं हमें,तुम किसी और का चाँद सही,
घर में रह कर पलता, खण्डहर भी देखना।
मेरा तरन्नुम मेरे दिल का हाल है ये,
मेरी आँखें मेरे दुखों का किताब है ये.