Saturday, September 21, 2013


दिल से ही दिल की राह होती है,
रौशनी की अंधेरों में पनाह होती है

एक किस्मत ही नहीं कोई वज़ह यहाँ जीने के लिये,
चलो साक़ी कोई बहाना तलाशें तुम्हे पीने के लिये .
हमारे संस्कार हमारे व्यक्तिगत शांती की संस्कृति है...... भारतीय संस्कार ही हमारी अपनी पहचान है....
हमारे कर्मों के लौटने की प्रक्रिया है हमें प्राप्त हुये फल.

Wednesday, September 18, 2013


उनका आईना उन्हें मुह दिखा न सका मग़र,
ये जनतंत्र "अधिकार" उन्हें रूह दिखा देगा।

Tuesday, September 10, 2013


ऐसी कोई नज़्म हो क़फ़न से छुड़ाकर ले आये,
बेआबरू आँखों को ख़ाबों से सजाकर ले आये.
नाम जो लें उनका कुछ रूमानियत छा जाये,
काश यादें हमारी उनकी नींदें चुराकर ले आये.
वो हैं ज़ुदा ज़ुदा मग़र दूर नहीं हमारे ख़यालों से,
है कोई ख़ुदा? दुनियाँ से उन्हें छुपाकर ले आये.
माना, ख़्वाइशें शोहरतों सी बेनाम दफ़न होंगी,
जवानी चार दिन की फिर कोई बुलाकर ले आये.
हम शाही राह नहीं मंजिल की रहती हमें तलाश,
लड़खड़ायें जो 'गर वो चराग़ जलाकर ले आये.
डर था कहीं बिख़र न जाऊ सूखे पत्तों की तरह,
वो हर चिंगारी राज दुनियाँ से बुझाकर ले आये.

आज भागलपुर की हालत देख कर मन बहुत दुखी हुआ और अनायास ही पूछ बैठा ....

नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहुं नास तव नाहीं।।
मुधा बचन नहिं ईश्वर कहई। सोई मोरें मन संसय अहई ॥ ... (रामायण - उत्तरकाण्ड)

इस प्रकरण में गरुड़, भुशुणिडजी से पूछ रहे हैं।  हे नाथ! मैंने शिवजी से ऐसा सुना है कि महाप्रलय में भी आप का नाश नहीं होता और ईश्वर (शिव जी) कभी मिथ्या वचन कहते नहीं। वह भी मेरे मन में संदेह है।
क्या यह पंक्ति आज इस युग में भी चरितार्थ है? क्या ईश्वर आज इस युग में भी जीवित हैं? और अगर हैं किसी भी नाम से तो फिर आज जीवित रहते हुये भी अपने सेवकों की पीड़ा नहीं देख पा रहा? क्या इस से भी बुरा हाल किसी शहर का हो सकता है?