Tuesday, September 10, 2013


ऐसी कोई नज़्म हो क़फ़न से छुड़ाकर ले आये,
बेआबरू आँखों को ख़ाबों से सजाकर ले आये.
नाम जो लें उनका कुछ रूमानियत छा जाये,
काश यादें हमारी उनकी नींदें चुराकर ले आये.
वो हैं ज़ुदा ज़ुदा मग़र दूर नहीं हमारे ख़यालों से,
है कोई ख़ुदा? दुनियाँ से उन्हें छुपाकर ले आये.
माना, ख़्वाइशें शोहरतों सी बेनाम दफ़न होंगी,
जवानी चार दिन की फिर कोई बुलाकर ले आये.
हम शाही राह नहीं मंजिल की रहती हमें तलाश,
लड़खड़ायें जो 'गर वो चराग़ जलाकर ले आये.
डर था कहीं बिख़र न जाऊ सूखे पत्तों की तरह,
वो हर चिंगारी राज दुनियाँ से बुझाकर ले आये.

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