Wednesday, June 5, 2013


डाला है मुक़द्दर ने हमें, इक़ ऐसे दौर में,
बदल के भी नहीं बदला यहाँ इन्सां कोई। 

Tuesday, June 4, 2013

कल एक नौजवान business man से मेरी मुलाकात हुई। उन्होंने ने कहा ..."भैया भागलपुर शहर में बहुत बड़े पैसे वाले हुवे हैं, हो रहे हैं और उन्होंने बहुत पैसा कमाया भी मगर अफ़सोस एक दो छोड़ कर बाक़ी किसी ने कुछ नहीं किया इस शहर और यहाँ के लोगों के लिए" उस नौजवान की नज़रों में एक अनकहा concern दिखा मुझे। इसी कड़ी में आप सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा इसे मेरा व्यक्तिगत विचार मान लीजियेगा, मैं ये विचार किसी को आघात या दुःख पहुँचाने की उद्देश्य से नहीं व्यक्त कर रहा हूँ .........

हर ट्रक  चालक भी आम आदमी है मगर उस ट्रक का मालिक और जहाँ उसने माल supply किया है वो दोनों ही ख़ास business man थे। मान लीजिये की कलक्टर और पुलिस अधीक्षक बाहरी हैं और दो चार मौतों से उनका कुछ नहीं बिगड़ता। उनके लिये पैसा और पोस्टिंग के आगे कुछ भी नहीं, मगर जहाँ उस ट्रक वाले ने सामान पहुँचाया वो तो इसी शहर के नागरिक हैं। इसी शहर के पैसे से उनका घर द्वार चलता है और समृद्धि मिल रही है। इसी शहर की वजह से उनका नाम है। उनकी सोच क्यों नहीं जागती की कब तक वो चंद रुपयों के लिये इस  तरह लोगों के जान से खेलते रहेंगे? क्या मंदिरों में भजन कीर्तन या मस्जिदों में जाने से इनके पाप धुल जायेंगे? शायद नहीं। मानव प्रेम और सेवा सबसे बड़ी आराधना है, उससे बड़ी कोई आराधना नहीं। उससे बड़ा कोई धर्म या कर्म नहीं। यहाँ एक और बात मैं कहना चाहूँगा, ऐसे पैसे से क्या फ़ायदा जो आप को मरणोपरांत आप के अपनों के बीच कम से कम ही जीवित न रख सके। क्यों आप दुनियाँ में जीवित रहते हुये इन्ही कार्य कलापों की वजह से वार्षिक तौर पर मात्र एक दिन के लिए याद किये जाना चाहते हैं, अपने मृत्यु उपरांत? आप याद कीजिये किसी पैसे वाले की मैयत को, किस तरह की बातें अपने सगे सम्बन्धी, दोस्त मित्र करते हैं। वो कहते नहीं थकते ..... "बहुत पैसा और संपत्ति पीछे छोड़ गये" .... इस वक़्त के बाद वो पैसा वाला अपने बच्चों के बीच वार्षिक कैलेंडर की तरह महज़ तारीख बन कर रह जाता है। क्या आप अपने कर्मों के द्वारा श्रद्धा पूर्वक समाज में मरणोपरांत भी जीवित रहना नहीं चाहेंगे? क्या आप नहीं चाहेंगे की आने वाली पीड़ियों में आप जिज्ञासा के कारण बने? जरा सोच के देखिये की क्यों जिस मंदिर में श्रद्धालुओं की तादाद ज्यादा होती है वो मंदिर अधिक जागरूक माना जाता है?... वो मंदिर उसमे बैठे भगवान की वजह से  जागृत नहीं है, परन्तु उसमे जाते हुए जीवित लोगों की वजह से है। जीव ही जागृत करता है पत्थर को भी,तो फिर क्यों नहीं हम मानव की सेवा करते? जरा सोच के देखिये .... "मृत्यु के बाद इस दुनियाँ में किस तरह सा जीवित आप रहने चाहते हैं? लोगों में जीवित रहने का तरीका सिर्फ और सिर्फ आप की हाथों में है .....

Monday, June 3, 2013

यारा! कैसे भुलाये जाते हैं रूख़सते ज़िन्दगी में?
हर कोई शादमानी में मुड़ के जो देख लेता है. .. Rajesh 
शादमानी = प्रफुल्लता

Sunday, June 2, 2013

जाने किन किन बातों को कहते गए,
ज़िन्दगी में हर शूल को हम सहते गये. 
ज़माने में दुश्मन, क्या कम थे दोस्त,
अपने घर में भी भाइयों में रहते गए। 
जाने किन किन बातों को कहते गए,..

Thursday, May 30, 2013

मन बनाइये की अब तो बदलाव ज़रूरी है,
सामाजिक सुख चैन का बहाव ज़रूरी है।
कभी ना भ्रष्ट वादाखिलाफों का नाम होगा,
अब तो पार लगे जनता की नाव ज़रूरी है। 

Sunday, May 26, 2013

यहाँ, "सभी चीजें बिकाऊ है" बिलकुल सही फ़रमाया हम सभी ने। इसी "बिकाऊ" होने की वज़ह से समाज गिरता चला जा रहा है बिना किसी रोक टोक के पतन की राह पर। जब ज़मीर ही बिकने लगा तो फिर और क्या बचा? अभी भी भारतीय समाज अगर बचा हुवा है तो संभवतः हम सभी के पूर्वजों के कर्म बेशकीमती रहे होंगे। देश और समाज जितना भी बचा हुवा है, चलिए अपने अपने छोटे दायरों में उसे हम और गिरने न दें। बिकने दीजिये बिकने वालों को लेकिन इस नवजवान पीड़ी में इतने संस्कार जरुर बाँट दीजिये ताकी इस "बाज़ार" पर मंदी छा जाये और पौराणिक संस्कारों के बोझ तले ये खुद ब खुद मर जाये। इस बाज़ार को कमज़ोर करने के लिए "मेहनत" की जरुरत नहीं बस "इच्छा" की ज़रूरत है, जो हम सभी में प्रचुर मात्रा में हमारे माता पिता और शिक्षक ने भर रखा है। चलिए मान लिया जाये आज की सुबह आने वाले अच्छे दिनों की शुरुआत है। 

Wednesday, May 22, 2013

Let us pass on the mantle of Country's leadership in safe hands…Srivastava Rajesh