यहाँ, "सभी चीजें बिकाऊ है" बिलकुल सही फ़रमाया हम सभी ने। इसी "बिकाऊ" होने की वज़ह से समाज गिरता चला जा रहा है बिना किसी रोक टोक के पतन की राह पर। जब ज़मीर ही बिकने लगा तो फिर और क्या बचा? अभी भी भारतीय समाज अगर बचा हुवा है तो संभवतः हम सभी के पूर्वजों के कर्म बेशकीमती रहे होंगे। देश और समाज जितना भी बचा हुवा है, चलिए अपने अपने छोटे दायरों में उसे हम और गिरने न दें। बिकने दीजिये बिकने वालों को लेकिन इस नवजवान पीड़ी में इतने संस्कार जरुर बाँट दीजिये ताकी इस "बाज़ार" पर मंदी छा जाये और पौराणिक संस्कारों के बोझ तले ये खुद ब खुद मर जाये। इस बाज़ार को कमज़ोर करने के लिए "मेहनत" की जरुरत नहीं बस "इच्छा" की ज़रूरत है, जो हम सभी में प्रचुर मात्रा में हमारे माता पिता और शिक्षक ने भर रखा है। चलिए मान लिया जाये आज की सुबह आने वाले अच्छे दिनों की शुरुआत है।
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