हम भारतीय छणों के लिए जीते हैं, जीवन के लिए नहीं। आन्दोलन अगर हो तो ऐसा हो कि समाज हमेशा के लिए सचेत हो जाये इन होनहार बालिकाओं के साथ लगातार होते घृणित बलात्कार और मौतों से. जब तक हम सभी इस छति को या इस तरह होते बच्चों की मौत को देश की छति नहीं मानेंगे तबतक दिवंगत होनहार बच्चियाँ या इस से पूर्व कालकवलित हुई, बस "किसी माता पिता की गुड़िया रह जाएँगी"। जागिये ! हर बच्चे के चेहरे की हंसी में अल्हड़ और मासूम बच्चपन, ख़ुशी में दिव्यता, संगर्ष में सात्विक शक्ती, पराक्रम में शालीनता, पराजय में जीत का विश्वास,सफलता में सौम्यता, रिश्तों में आदर और प्रेम, चरित्र में स्वच्छता,कर्म और धर्म में अडिग समन्व्यय सिखाना हम बड़ों का कर्त्तव्य है एक सुरक्षित समाज और प्रगतिशील भारत के लिये। वर्ना भारतीय संस्कृति के अनुरूप आगे पीड़ियों को अपने आयु में सही ज्ञान और सुरक्षित समाज की प्राप्ति कैसे होगी?