परमात्मा के बग़ैर कुछ भी नहीं होता. वो रौशनी और अंधकार दोनो का प्रेरक है. अपने अंदर जब हम रौशनी जगा लेते हैं तब हमें बाहर व्याप्त उजाले का एहसास करने में सुविधा होती है. उसी तरह अँधेरे को देखने-समझने की प्रवृति भी मजबूत हो उठती है। अँधेरे के ज्ञाण के उपरांत उसे दूर करना आसान है.
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