Thursday, August 22, 2013


बहुत ठिकानों पर अबतलक जी रही थी ज़िन्दगी,
मुड़ के जो देखा तो कहीं एक भी मुक़म्मल नहीं।

Tuesday, August 20, 2013

पाप में सहयोग नहीं, कर्म में लोगों को जोड़ना और धर्म को व्यक्तिगत रूप में निभाना मानव की स्वयं की अभिव्यक्ति है  … Rajesh Srivastava 

Sunday, August 18, 2013


मै राख़ से उठा हूँ मुझे शाख़ की क्या ख़बर,
मै बेनक़ाब तब भी था आज भी बेनक़ाब हूँ।

वो ख़ाब में आते आते दूर हो कर रह गए,
शब् में शबनम सी हम चूर हो कर रह गए।
फिसले जो ना लब्ज़ वो ज़ुबां बाक़ी है,
इक़ कोना प्यार का वो मकाँ बाक़ी है। 
नफ़रत-ए-निगाह से जाने कब छा गये?
क़त्ल-ए-हिज़ाब से कुछ बयाँ बाक़ी है।

बेताब ज़माने की खिड़कियाँ कैसी?
हमारे पाव में दिखतीं बेड़ियाँ कैसी?
आज़ाद मुल्क में बंटे हैं लोग तमाम,
ख़ामोश समंदर में मजबूरियां कैसी?

Monday, August 5, 2013

साँसों को क्यों ज़िन्दगी का पता समझ बैठे?
नसीब हमारी मोहब्बत को तुम ख़ता समझ बैठे। 
नासमझ थे हम, बेइन्तेहाँ 'वफ़ा' करते चले गए, 
हमारी सादगी को तुम हमारी 'सज़ा' समझ बैठे।