Saturday, March 30, 2013


तेरी नूर से ही बिस्मिल हर ख़ुशी है ज़हां में,
रौशन तो सितारे भी खुद ब खुद नहीं होते।
क्यों खोये हो अपनी शान-ए- शोहरत में,
मौसम को बदलते भी कहाँ देर लगता है?
वो आवारा बादलों की तरह इतरा कर चले गये,
कभी बरस कर देख लेते हमारी भी ज़िन्दगी पर।

Friday, March 22, 2013

दस्तक देती हवाएँ इन ख़ामोश गलियों में,
क्यों फ़ैली ख़तायें इन ख़ामोश गलियों में। 

Thursday, March 21, 2013

अतीत प्रेरणा और सत्य है, वर्त्तमान कर्म परंतु छणभंगुर जीवन और भविष्य एक अपूर्ण उम्मीद  ….
ग़में इश्क़ में क्या दरो दीदार करेंगे?
पतझड़ में सूखे पत्ते क्या बहार करेंगे? 
ख़ुशी क्या बला है कौन जाने ज़ानिब,
किन बेवफ़ाओं पे आप ऐतबार करेंगे?

इक शहर यहाँ दफ़न देखो तारीख़ खामोश है,
इतनी सहमी सी है ज़िन्दगी नहीं क्यों होश है?