Adhure Ehsaas
Sunday, August 18, 2013
मै राख़ से उठा हूँ मुझे शाख़ की क्या ख़बर,
मै बेनक़ाब तब भी था आज भी बेनक़ाब हूँ।
वो ख़ाब में आते आते दूर हो कर रह गए,
शब् में शबनम सी हम चूर हो कर रह गए।
फिसले जो ना लब्ज़ वो ज़ुबां बाक़ी है,
इक़ कोना प्यार का वो मकाँ बाक़ी है।
नफ़रत-ए-निगाह से जाने कब छा गये?
क़त्ल-ए-हिज़ाब से कुछ बयाँ बाक़ी है।
बेताब ज़माने की खिड़कियाँ कैसी?
हमारे पाव में दिखतीं बेड़ियाँ कैसी?
आज़ाद मुल्क में बंटे हैं लोग तमाम,
ख़ामोश समंदर में मजबूरियां कैसी?
Monday, August 5, 2013
साँसों को क्यों ज़िन्दगी का पता समझ बैठे?
नसीब हमारी मोहब्बत को तुम ख़ता समझ बैठे।
नासमझ थे हम, बेइन्तेहाँ 'वफ़ा' करते चले गए,
हमारी सादगी को तुम हमारी 'सज़ा' समझ बैठे।
Monday, July 22, 2013
.....चादर रहनुमाई का ...
ग़म - ए- समंदर है यारा
हरजाई
का,
अब तौबा करें उन की
बेवफ़ाई का।
जवानी के दिन हैं वो गुमां में चलते हैं,
वाह!अदा हो तो उनकी अदाईगी का।
दिल हाँथ ही क्यों ना मलता रह जाये,
क़ैद हम कर लेंगे वो अक्स ज़ुदाई का।
तक़दीर की बातें बुझदिल कीया करतें हैं,
आया है वक़्त हमारी हुनर आज़माई का।
वादों पर ही 'राज' चलो जी कर देख लेंगे,
आ भी जावो ओढ़ा दो चादर रहनुमाई का।
ग़म -ए- समंदर है यारा हरजाई का ...
Saturday, July 20, 2013
तेरे ज़मीर के मुक़ाबले दुनियाँ में होंगे बहुत,
मग़र कहीं एक घर तेरी परछाईं सा तो मिले।… Rajesh Srivastava
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