Thursday, March 21, 2013

उन की बस्तियों में जाने कैसा दिन बसर होगा,
राह में भटकता कौन शराबी मुझ सा बेख़बर होगा।

कोई हसरत हो जो मेरी ज़िन्दगी पूरी कर जाये,
ख़ुदा मान लूँ उन्हें 'गर जीना ज़रूरी कर जाये।

Tuesday, March 19, 2013

कुछ दिन अभी अगर, दीवार रह जाये,
काश!नफ़रतों में भी वो प्यार रह जाये। 
वो मज़हबों की सरहदों में खोये खोये हैं,
गले मिले हम और नज़र दीदार रह जाये।

Friday, March 8, 2013


'ज़िन्दगी' चल तुझे ख़ुशी हम देंगे,
हर ग़म में दिल तुझे हंसी हम देंगे।

मैं अतृप्त हूँ, तृप्त कर दो


मैं अतृप्त हूँ, तृप्त कर दो,
वर्षों से यूँ ही बैठी,
सत्य से स्पर्श को,
सम्मान से परिचय को,
प्रेम में उन्मुक्त को,
अपने मत्रितित्व के पहचान को,
तुम से मिले अधिकार को,
मैं अतृप्त हूँ, तृप्त कर दो.

देखो! मैंने तुम्हें आकार दिया,
मैंने तुम्हें प्यार दिया,
मैंने तुम्हें, अधिकार दिया,
मैंने, तुम्हारे अस्तित्व को,
आदर्शता का एहसास दिया,
स्वप्न सहेजने का वो मन दिया,
मैंने तुम्हें, "तुम्हारा" संसार दिया,
ये सब तुम्हें दे कर भी, 
अतृप्त हूँ, तृप्त कर दो.

क्यों? तुम ने मुझे क़ैद किया,
अपने छणिक शर्म के आईने में,
अपने स्वार्थ के बामियों में,
अपने दिखावे के श्रृंगार में,
अपने धुंद से घिरे तिरस्कार में,
अपने असत्य काव्य के संसार में,
क्या मैं अतृप्त हूँ? तृप्त कर दो.

मैं तो नारी हूँ उस नर की,
आराधना हूँ देवों की,
शक्ति हूँ संघर्ष की,
आस्था हूँ सोच की,
प्रेम हूँ आराधना की,
सत्य हूँ संसार की,
फिर भी मेरे सम्भोधन को ही देखो,
तुम ने 'स्त्री' अधूरा रखा,
विडम्बना है, 
कैसे? मांगती हूँ मैं तुम से,
बोलती हूँ मैं तुम से,
पाऊँगी, "क्या" मैं तुम से?
नहीं! शायद तुम वो नहीं,
जिस से मुझे अधिकार की अनुभूति हो,
पूर्ण होने का एहसास हो,
फिर भी, चलो,
एक स्वप्न, एक भ्रम ही सही,
तुम्हारे इसी अधूरेपन से शायद,
कभी मैं पूर्ण हो जाऊँ,
और अपने जीवन के लक्ष पाऊं,
मैं, अतृप्त हूँ, तृप्त कर दो.

मेरी व्यथा की ये कहानी,
क्या कभी अंत नहीं होगी?
देखो! मैं तुम संग जीवन में कभी,
पूरी नींद नहीं सोयी,
कभी बेटी,
कभी बहिन,
कभी संगिनी,
तो कभी माँ बन,
तुम से मन से प्रेम करती रही,
फिर भी न पा पाई,
तुम्हारा वो सत्य संसर्ग,
ना कभी जन्म में, न जीवन में,
न ही कभी मृत्यु की शैया पर, 
क्यों फिर भी ना उम्मीद नहीं मैं !
चलो कोई बात नहीं, 
अपने त्याग को,
आज फिर से भूल जाऊँगी, 
चाहूँगी, मुझ अतृप्त को,
अब तो तृप्त कर दो!
किसे आज़माएँ यहाँ?किस किस से वफ़ा कर बैठे,
हम औरों की क्या बात करें खुद से ज़फ़ा कर बैठे।

Thursday, March 7, 2013

लहू में शामिल ये दौर, ये बहार क्यों है?
हर कोई अपने जनाज़े में सवार क्यों हैं?